ढलती शाम सूर्यास्त पर कविता Poem On Sunset In Hindi

नमस्कार दोस्तों आज हम ढलती शाम सूर्यास्त पर कविता Poem On Sunset In Hindi पढ़ेगे. ढलते सूरज की शाम में गौधूली वेला के मनोरम दृश्य को आज की कविताओं के जरिये विभिन्न लेखकों ने अभिव्यक्त किया हैं. हमें आशा है आपकों सनसेट की ये शोर्ट स्वीट कविताएँ जरुर पसंद आएगी.

ढलती शाम सूर्यास्त पर कविता Poem On Sunset In Hindi

ढलती शाम सूर्यास्त पर कविता Poem On Sunset In Hindi

सूर्यास्त आलोकधन्वा कविता

बहुत देर तक सूर्यास्त
लंबी गोधूलि
देर शाम होने तक गोधूलि
एक प्राचीन देश का सुदूर
झुकता हुआ

प्रशांत अंतरिक्ष
मैं बहुत क़रीब तक जाता हूँ
एक महाजाति की स्मृति
मैं बार-बार वापस आऊँगा
दुनिया में मेरे काम
अधूरे पड़े हैं

जैसा कि समय है
कितनी तरह से हमें
निस्संग किया जा रहा है
बहुत बड़ा लाल सूरज
कितना धीरे-धीरे डूबता
विशाल पक्षियों के दुर्लभ
नीड़ उस ओर!

सनसेट कविता

उसे बड़ा अभिमान है,
दुनियाँ में वही ही तो महान है
ऊष्मा का संचार उसी से
जीवों में प्राण उसी से
यकायक तन्द्रा टूट गई
कहीं दूर भीड़ को देखकर
लोग ख़ुशी से झूम रहे थे
उसे डूबता देखकर.

Sunset Poem in Hindi

उसे डूबना होता है
थके हुए दिन का बोझ
काँधे पर उठाकर
नैनों में विस्तारित अबूझ
प्रश्नों की श्रंखलाओं के
सरलीकरण समाधान ढूढ़ते

किन्तु विवशता का हठयोग
अपना तिलिस्म नहीं दिख पाता
सारी पहेलियाँ बो दी जाती है
सांध्य गीत की पंक्ति दर पंक्ति

जिसे सींचती है निशा
अपनी गहन सोच से
और किसी नीरव निशीथ प्रहार में
फूट पड़ते है अंकूर
अबूझ प्रश्न के उत्तर

Sunset Kavita

सूरज ढलकर पश्चिम पंहुचा
डूबा संध्या आई, छाई
सौ संध्या सी वह संध्या थी
क्यों उठते उठते सोचा था
दिन में होगी कुछ नई बात
लो दिन बीता, लो हुई रात

धीमे धीमे तारे निकले
धीरे धीरे नभ में फैले
सौ रजनी सी वह रजनी थी
क्यों संध्या में यह सोचा था
निशि में होगी कुछ बात नई
लो दिन बीता लो रात हुई

चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी
पूरब से फिर सूरज निकला
जैसे होती थी सुबह हुई
क्यों सोते सोते सोचा था
होगी प्रात कुछ बात नई
लो दिन बीता, लो रात हुई

Hindi Poem On Sunset

ये ढलती शाम के रंग की
कुछ अलग ही बात है,
कभी जिंदगी के बीते दिनों की

याद दिला के जाती है,
कभी कोई गलती जो हो चुकी है
उसे अपने साथ ढाल के
मानो भुलाती जाती है।

कभी खिलते रंगो के साथ
किसी हसीन वक़्त की
खुशहाली याद दिलाती है,
कभी लहराती हुई ठंडी हवाओं के साथ
कोई मन को छू जाने वाली
खुशबू को खींच लाती है।

कभी किसी के साथ बितायी
उस हसीन शाम के वक़्त
की यादों में डूबा देती है,
और “संध्या” ये सुहानी शाम
सूरज से मिलते ही
खूबसूरत रंगों को ओढ़ के
मानो खुद को दुनिया में बिखेरती है।

सूर्यास्त पर कविता

अहो कैसी यह सूर्यास्त की बेला
हो रहा रवि क्षितिज अस्त
चित्त को कर रहा अस्त व्यस्त
नयन आकुल प्रिय मिलन को
आतुर पग चलने को आश्वस्त

पंछी चले अपने नीड़ को, छोड़ जगत का मेला
अहो, कैसी यह सूर्यास्त की बेला

पीत किरणों का विस्तार धरा पर
दिनकर संग चन्द्र दिखे गगन पर
देवालय हो रहे गुंजित आरती से
औ दीप है प्रज्वलित देहरी पर

शिथिल पग से चल रहा, यह पथिक अलबेला
अहो, कैसी यह सूर्यास्त की बेला

शाम की बेला

पंछी लौट रहे घर को
सिंदूरी रंग चढ़ा अम्बर को
तनिक आभास नहीं छैल भंवर को
डूबा के सांझ कर दी दोपहर को
धीरज होता नहीं रजनीकर को
सज धज के बैठ गया सफर को
चितेरा पाठ पढ़ा गया पहर को
कौन रखता है तुझसे हुनर को

संध्या कविता

अस्तांचल भास्कर गरिमा कैसे करूं बखान
यामिनी बेला आने की यही है सत्य रुझान
दिनभर दिनभर चलकर करने अब विश्राम
सूर्यास्त पावन बेला उन्मुक्त साष्टांग प्रणाम
पश्चिम दिशा छितराई कनक प्रभा अम्लान
कण कण वसुधा जल थल सरिता बनाम
गाई लौटी गाँव उड़ी गोरज भस्म अगवान
देवालयों में गूंज उठी इष्ट को मनोहर गान

सनसेट पोएम इन हिंदी

मिलूंगा मैं उनसे
वक्त की कगार पर
सदी का सूर्यास्त तो होने को है
चलो मिलते हैं
चार कंधो के हार पर
दिन पे दिन गुज़र गए
परिंदे भी यहाँ नहीं आते
उनकी यदि आती रहेगी
चलो समंदर के पार तक
सदी का सूर्यास्त होने को है
उनकी चिता के भस्म से
करने को सिंगर चलो
देव भूमि की ओर
हो चूका है इस सदी का सूर्यास्त
उनको नमन किये चले
जिसने समरण कराया
उनके सूर्य के अस्त होने पर
दो पुष्प अर्पित करते है
चलो चले सदी के सूर्यास्त तक

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