शिक्षक दिवस पर कविता | Poem on teachers day

Poem on teachers day-जैसा कि आप सभी जानते हैं. 5 सितम्बर 2017 कों पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस अवसर पर शिक्षक दिवस (teachers day) मनाने जा रहे हैं. हरेक बालक के व्यक्तित्व निर्माण और जीवन में यदि उसने कुछ हासिल किया हैं, तो इसका कुछ श्रेय उनके शिक्षक को भी जाता हैं. गुरु जिन्हें हमारी सभ्यता ने ईश्वर के समक्ष सिहासन प्रदान किया हैं. हमारे लिए अपने शिक्षक सम्मानीय हैं. उनके सम्मान को शब्दों द्वारा व्यक्ति करने के लिए आज हम कुछ बेहतरीन शिक्षक दिवस कविताएँ (shikshak divas kavita) लेकर आए हैं. इन teachers day poems का उपयोग आप अपने शिक्षक दिवस समारोह में भी कर सकते हैं.

शिक्षक दिवस पर कविता | Poem on teachers day

गुरूजी, चलें
गुरूजी
चलिए हम खेतों में चलकर
मेहनतकशों से दोस्ती करें
मेहनत से काम करते बच्चों के साथ
मिल कर काम करें
और
धरती को अपने पसीने से सींचें
जैसे तेज बहाव के साथ
पानी की स्वच्छता बढती है
वैसे ही काम के साथ
सचेतनता भी बढती है

..
रटते- रटते तो
हम पत्थर बन जाते हैं
काम से बढती है समझ
और समझ से काम
आज से हमें
नहीं चाहिए रिक्त पाठ
और बिलकुल नही चाहिए
सिर्फ अंक देने वाली पढाई|


teachers day poems (poems for teachers )

मेरे भीतर का शिक्षक ,
व्यथा सुनाता है;
बीत गया दौर सम्मान का,
अब भय से थर्राता है।

..
ऊँची -ऊँची अट्टालिकाओं से,
उसका मन घबराता है।
छोटे -छोटे गुरूकुलुओं को।
भूल न पाता है।
मेरे भीतर का शिक्षक
व्यथा सुनाता है।
ज्ञान अर्जन बहुत किया ,फिर भी अज्ञानी कहलाता है।
अर्थ का लोभ उसे भी,
ऐसा सुनने में आता है।
मेरे भीतर का शिक्षक—-
कभी चाण्यक ,आर्यभट्ट कभी कृष्नन् स्मरण हो आता है।
व्यवस्थाओं से लड़ता -भिड़ता,
स्वयं को आज भी पाता है,

..
मेरे भीतर का शिक्षक—-
गुरु ज्ञान अब सीमित हुआ,
अब कौन सुनने को आता है ,
है शिष्य तो भरपूर मगर।
विरला कोई ज्ञान को भाता है।
मेरे भीतर का शिक्षक—–
गोविन्द को गुरु गौड़ कर गए
शिक्षक कलाम सीखाता है।
आज भी जिनके घर का चुल्हा,
उनका संस्कार जलाता है।
मेरे भीतर का शिक्षक—
सच्चा शिक्षक आज भी
मन को धिक्कार लगाता है,

..
व्यवसाय से व्यवसाए ही जन्मे
यह सिखलाता है।
मेरे भीतर का शिक्षक —
संस्कारों की ले पोटली
वो आज भी शाला जाता है,
थक जाता है कुनीतियों से,
उन्हें जब खुद पर हावी पाता है।

..
मेरे भीतर का शिक्षक—
वितरित कर ज्ञान विश्व को
जी उसका तो चाहता है,
केवल सम्मान ही खोजता है।
पर आज उसे न पाता है।
मेरे भीतर का शिक्षक
व्यथा सुनाता है ,
बीत गया दौर सम्मान का
अब वह भय से थर्राता है।
रुपेन्द्र राज तिवारी।।

poem on teacher (teacher poems )

लोग कहते है अगर हाथों की
लकीरें अधूरी हो तो
किस्मत अच्छी नहीं होती
लेकिन हम कहते है की
सर पर हाथ हो अगर
” गुरू ” का तो
लकीरों की ज़रूरत

.
नहीं होती ।”
शिक्षक दिवस पर एक कविता
विद्यासागर ज्ञानसरोवर हैं शिक्षक
शिक्षा की राहों के रहबर हैं शिक्षक
हम वो शब्द हैं जिनके अक्षर हैं शिक्षक
सबसे बढ़कर सबसे बेहतर हैं शिक्षक
हम वो फूल हैं जिनकी ख़ुशबू हैं शिक्षक
हम हैं रात तो जगमग जुगनू हैं शिक्षक
सर चढ़कर बोले वो जादू हैं शिक्षक
हम वो हाथ हैं जिनके बाज़ू हैं शिक्षक

..
धूप में तपते सर पर आँचल हैं शिक्षक
अमृत का घट हैं गंगाजल हैं शिक्षक
पक्षपात से दूर हैं निश्छल हैं शिक्षक
अपनी हरिक समस्या का हल हैं शिक्षक
ज्ञान सुमन की अनुपम माला हैं शिक्षक
शिक्षा का अनमोल उजाला हैं शिक्षक
सूर्य की किरणे चाँद का हाला हैं शिक्षक

..
जग की सर्वोत्तम गुणशाला हैं शिक्षक
शिक्षक दिवस पे यूँ ही मन में रहे लगन
SHIKSHAK दिवस पे यूँ ही कटते रहें रिबन
ES दिवस पे यूँ ही सजता रहे चमन
शिक्षक दिवस पे हर शिक्षक को मेरा नम
गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर
गुरु साक्षात् परब्रम्ह तस्मे श्री गुरुवे नम:

poems about teachers (कविता शिक्षक दिवस पर)

‘प्रभुता पाई काहि मद नाही ‘ तुलसी बाबा भले कह गए
जिसमे वाजिद अली बह गया उसी बाढ़ मे आप बह गए
आप बने शिक्षा – मंत्री तो देहातो के स्कूल ढह गए
हम तो करते रहे पढ़उनी, जेल न जाके यही रह गए


और आपका तो कहना क्या, मुह से बहे आरत की धारा
आदर्शो की छोउक मारकर अजी आपने हमें सुधारा
उपदेशो की धुआधार मे अकुलाता शिक्षक बेचारा
अजी आपको लगता होगा सुखमय यह भूमंडल सारा 

teachers day poems in Hindi (nspirational poems for teachers)

आत्मा को
परम पिता
परमेश्वर से
मिलाने की खातिर ही
जन्म लेता है इंसान ,
और फिर धीरे धीरे
कर्म करता जाता है
इस धरा पर ,
किन्तु ,कभी कभी

..
सद्द्मार्ग पर चलते चलते
भटक जाता है वो
और बन जाता है
खुद एक शैतान
आखिर वो है तो
एक “इंसान” ही न
—–संजय कुमार गिरि

poem for teachers day (poem on teachers day in Hindi)

जय बुद्ध भूमि… जय पूर्वांचल… जय बुद्ध प्रदेश।
यह न हिंदू थे न मुसलमान थे।
सिर्फ और सिर्फ इंसान थे।
यह भी इसी समाज में पल कर हुए बड़े
फर्क इतना था कि यह पढ़े ही नहीं बल्कि थे कढ़े।
दौलत नहीं सम्मान इकट्ठा किए ये कितने नादान थे?

..
यह न हिंदू थे न मुसलमान थे।
दोनों को ही संकीर्ण सोच वालों ने नहीं पसंद किया।
इन बातों से बेपरवाह इन्होंनेजीवन भर बस सत्य जिया
न शादी न कोई वारिस सचमुच कितने ये महान थे।
यह न हिंदू थे न मुसलमान थे।
सिर्फ और सिर्फ इंसान थे। – – – भुवनेश्वर शर्मा

thank you teacher poems (teachers day poem in hindi )

“गुरु गुंडे” दोनु खड़े काके काटु पाए….
किस पर अब विश्वास करू…
सब एक नज़र ही आए……
ये शिक्षा का व्यापार करे…
पद की गरिमा की लजाए…..
ज्ञान का दीप बुझाए….

..
लालच की अलख जगाए…..
शिष्य की इतनी मार करे…
वो शिक्षा से डर जाए…..
शिष्या पर जैसे बाज कोई…
यूँ गंदी नज़र गड़ाए…..
अब काम तमाम है पुस्तक का…
सुविधा को दुविधा बनाए…..

..
ये रूप कभी था ईश्वर का…
अब ईश्वर भी लज्जाए…….
अब स्वार्थ बढ़ गया…
भूख बढ़ गयी…..
कोई शिक्षित कैसे बन पाए….
ऐसे शिक्षक पाने से अच्छा….
हम अनपढ़ ही मर जाए…..
‘गुरु दिवस” की आभा…
कुछ इन पर भी पड़ जाए……
“गुरु गोविंद दोनु खड़े काके लागू पाए”..
मन मेरा फिर से गाए…..
नोट:- कृपया जिनकी दाढ़ी में तिनका हो वो चोर शोर ना मचाए…….
“इंदु रिंकी वर्मा”

short poems for teachers (best teacher poems )

मैं एक शिक्षक हूँ
एक ऐसा शिक्षक
जो सिखाने से
अधिक सीखता है
अपने विद्यार्थियों से
जब आते है वो
समय पूर्व हमेशा
तो सीखता हूँ उनसे

..
समय का सम्मान करना
जब लेते है आज्ञा
प्रत्येक कार्य से पूर्व
तो सीखता हूँ उनसे
बडों का मान रखना
जब करते है कार्य
कक्षा में दिया गया
तो सीखता हूँ उनसे

..
सौन्दर्यपूर्ण सृजनात्मकता
जब व्याख्यान के मध्य
ऊंघते हुए वे लेते है उबासी
तो सीखता हूँ उनसे
पाठ्यवस्तु की रोचकता
जब देखता हूँ उनको
क्रीडांगण में दौड लगाते
तो सीखता हूँ उनसे
स्वस्थ शरीर की महत्ता
जब देखता हूँ उन्हें
साथ बैठकर खाना खाते

..
तो सीखता हूँ उनसे
सामाजिक समरसता
उन युवाओं के बीच रहकर
मैं भी युवा रहता हूँ
इसीलिए गर्वपू्र्वक स्वयं को
चिर युवा कहता हूँ
उनकी ओजस्विता को मैं
देखता रह जाता हूँ
बनकर नक्षत्र अपना तेज
उन दैदीप्यमान सूर्यों से पाता हूँ

..
जितना मैं देता हूँ उनको
उसका कई गुना लौटाते है
प्रतिदिन वो प्यारे बच्चे
मुझे पाठ अनेक पढाते है
मैं सीखाता उन्हें एक पाठ
वे दस पाठ मुझे सीखाते है
आप ही बताओ प्यारे मित्रों
सच्चा शिक्षक आप किसे अब पाते है

poem for a teacher (teacher poem in hindi)

हाथ जोड़कर नमन करूं
गुरूवर वंदन स्वीकार करो
टूटी फूटी कविता हूं
गुरुवर मेरा परिष्कार करो
ज्ञान की ज्योति जला दो गुरूवर
जीवन सफल बने मेरा
ईश्वर के दर्शन करवा दो
मुझ पर ये उपकार करो

teacher appreciation poems

जद राजनीति धर्म गी बांदी बण ज्यावै
लोग बंदूकां गी नाळी पर सांस गिणै
आदमी आपगी लाश आप ही चक्यां फिरै
टाबर अर लुगाइयां बाहर लिकड़ण हूं डरै
छोटी – छोटी छौरियां गै लोग बटका भरै
पांच रिपियां गी खातर बेली – साथी नै मारै
पढ़ण खातर टाबर तरसण लागज्यै

..
अर भर्तियां गी लेण म्है खड़्या ही पड़ै
जद आंधा सेरणी बांटण लागज्यै
अर ठाडै गो डोको डांग नै पाड़ै
तो समझ ल्यो मूलक म्है अंधेर मचज्यै
इं अंधेर म्है भटकतां बाळकां नै जै कोई चानणो दिखावै
तो वो शिक्षक है

..
जो वानै स्याणी – स्याणी बात सुणावै
आच्छै बुरै गी पहचाण करावै
झूठ – फरेब नै काढ़ भगावै
लुच्चई – लालच हूं चोगा करावै
अन्याय – शोषण गै खिलाफ बुलावै
तर्क विधि हूं सोचणो सिखावै
भ्रम काढ़गे दूर भगावै
आगै बढ़ण नै राह दिखावै
सही रास्तै पर ले ज्यावै
अर फेर जे इस्यो टेम आज्यै
कै वे ही शिक्षक

..
कलासां म्है तो कम पढ़ावै
ट्यूसनां गा पिस्सा कमावै
प्रोपर्टी गो धंधो चलावै
आपस म्है वे मर – कट ज्यावै
चेला पाळै चरण छुवावै
जात – धर्म म्है फसै – फसावै
छौरियां पर नजर डिगावै
भटकण और भटकाण लागज्यै
तो क्यूकर आस जगै ?
तो क्यूकर आस जगै??

गुरु पर कविता

परीक्षाभवन में आज फिर होने लगा आत्ममंथन मेरा
काश कुछ पढ़ा होता याद कुछ करा होता
प्रश्नपत्र देखते ही मेरा सर चकरा गया
पढ़ी थी अमोनिया, फास्फोरस आ गया
छात्र एकता संकल्प हमारा है
आज तो बस नकल का ही सहारा है
मैंने सोचा पानी पीने जाता हूँ
वहीं इधर उधर से दो चार पर्ची ले आता हूँ
मैंने पूछा सर पानी पीने जाऊँ
सर बोले ज्यादा प्यासे हो तो पानी वाले को यहीं बुलाऊँ

..
कैसे दूँ मैं गुरु को झांसा मेरा मन पर्ची का प्यासा
हाय कितने सख्त शिक्षक रूम में पड़े हैं
आधे घंटे से मेरे ही सर पे खड़े हैं
मैंने सर को भोलेपन से देखा और ब्रह्मास्त्र फेंका
सर पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत खराब रही है
इधर बहुत गर्मी लग रही है
सर मेरे साथ थोड़ी रियायत कीजिये
मुझे उस पंखे के नीचे बिठा दीजिये

..
सर बोले उधर का पंखा तो और भी धीरे चल रहा है
उधर बैठे बच्चों के देखो कितना पसीना निकल रहा है
तुम मेरी कुर्सी पे आओ समय निकल रहा है
कुछ छात्र तो उत्तर लिख रहे थे
लेकिन अधिकतर परेशान दिख रहे थे
तभी एक छात्र बोला
सर इतनी सख्ती, क्या ये सही है
ऐसे माहौल में बहुत परेशानी हो रही है
गुरु जी बोले मैं नकल नहीं करने दूँगा
गर्दन हिली तो कॉपी छीन लूँगा
सर ये आप कर क्या रहे हैं,
परीक्षा का इस तरह मखौल मत उड़ाइए

..
जाइए थोड़ा पान वान खाकर आइये
हमारे उतरे हुए चेहरे देख गुरुजी मंद मंद मुस्काने लगे
और अपनी जेब से पान की पुड़िया निकाल वहीं पान खाने लगे
लगता है आज मैं अपने शाकाहारी व्रत को बचा नहीं पाऊँगा
अपने जीवन का प्रथम अंडा इसी प्रश्नपत्र में खाऊँगा
शायद ये मेरे पिछले कुकर्मों का हिसाब है
आज भाग्य भी कुछ ज्यादा ही खराब है

..
अंततः मैं बोला ठीक है सर इजाजत दीजिये
बहुत हुआ अब मेरी कॉपी जमा कर लीजिये
इस घटना के दो महीने बाद,
पिताश्री अपनी अभिव्यक्तियों को मुझ पर वार रहे थे
मेरे ही भीगे जूतों से मेरे केश संवार रहे थे॥
मेरे जैसे सभी परीक्षार्थियों के साथ सहानुभूति सहित

शिक्षक पर हास्य कविता

कल हम चाहते थे
शिक्षक पिता
दस या बीस का पहाड़ा पूछें
लेकिन उन्होंने हमेशा
तेरह-सत्रह और उन्नीस का पहाड़ा पूछा
कैट-मैट-रैट की स्पेलिंग कभी नहीं PUCHI
हमेशा एरोप्लेन और अम्ब्रेला की मीनिंग् PUCHI

..

भरी कक्षा में मुँह लटक जाता हमारा
डाँट पड़ती
जब वो इतना कठिन पूछते
तब हमें लगता वे ‘अच्छे पिता जी’ नहीं हैं
जब हम अटक-अटक कर बता देते
तब उनके चेहरे पर
‘ हमारा अच्छा बेटा’ वाला भाव जरूर दिखता था
आज भी जब हम करते हैं कोई मुश्किल काम
याद आ जाता है हमें पिता का चेहरा
और पिता इस सब से अंजान
हमारे बच्चों को याद करा रहे हैं ‘क’ से कबूतर
‘ख’ से खरगोश

..
पूछ रहे हैं दो का पहाड़ा और एप्पल की मीनिंग
और इस तरह खुश हो रहे हैं
जैसे बच्चे तेरह- सत्रह का पहाड़ा सुना रहे हों
यह देखकर हम मुस्कुराते हैं
स्मृतियों में बसे बचपन में चले जाते हैं……
गौरव पाण्डेय

शिक्षक दिन कविता (शिक्षक दिवस पर एक कविता)

दिया है ज्ञान की ज्वाला,अंधेरे को मिटा कर के
बना डाला हमें सोना, लोहे से बदलकर के
किया उपकार हमपे है,चुकाउ मैं भला कैसे
इन्हें चरणों को पूजू मैं, अपना सर झुकाकर के
.
कभी कुछ शब्द कहता हूँ, बड़ी तारीफ होती है
मेरे हर एक हर्फो में यही तालीम होती है
यहां सब लोग कहते है,बड़ी उम्दा गज़ल तेरी
मेरे सर पे मेरे गुरु की सदा आशीष होती है
.
कवि हिमांशु पाण्डेय

hindi Poem on teachers day

गुरुवर
आपकी महिमा का हर पल करूँ मैं बखान
ज्ञान के सागर है मेरे गुरुवर, मैं बालक नादान
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
माता पिता ने चलना सिखाया
आपने गुरुवर अंधकार मिटाया
मैं मूर्ख, गुरु तो परम् सुजान
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
भेद भाव से आगे हो तुम

..
सब जग सोया, जागे हो तुम
आप दयालु, आप करुणा निधान
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
शब्द ज्ञान के आप हो दाता
आप ही पिता हो ,आप ही हो माता
दूर हुआ मन का अज्ञान,
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
आप ने डांटा, प्यार भी लुटाया
दुनिया मे चलने के काबिल बनाया
आप के चरणों का हम करे ध्यान
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
निंदा नफरत से दूर रहना सिखाया
प्यार प्रीत का हमको पाठ पढ़ाया

..
गुरुवर होते गोविंद समान
गुरुवर, आपकी महिमा का…..
एहसान गुरु के भूल न जाये
ज्ञान के पथ पर बढ़ते जाये
“गोपी” गुरु के कर्म महान
गुरुवर, आपकी महिमा का हर पल करूँ मैं बखान
गोपी डोगरा

उम्मीद करते हैं मित्रों शिक्षक दिवस पर कविता का यह लेख आपकों पसंद आया होगा. शिक्षक कविता से सम्बन्धित आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो प्लीज कमेंट कर जरुर बताए.

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