दल बदल की राजनीति पर निबंध | Dal Badal Essay In Hindi

दल बदल की राजनीति पर निबंध | Defection/Dal Badal Essay In Hindi

विश्व के किसी भी देश का उदहारण उठा कर देख लो, जहाँ गठबंधन की सरकारे बनती हैं. वहां दल बदल की राजनितिक समस्या विद्यमान रहती हैं. लोकतंत्र जनता का शासन होने के उपरांत भी इस में जनता कुछ भी कर पाने में समर्थ नही होती हैं. दरअसल राजनितिक पार्टी अथवा दल समान विचारधारा तथा सिद्धांतों में विश्वास करने वाले लोगों का समूह होता हैं. जो अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर निजी स्वार्थ या विपक्षी पार्टी द्वारा प्रलोभन दिए जाने के कारण वो मौजूदा पार्टी जिसके चुनाव चिह्न पर वो चुनाव जीते हैं, छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं, इसे ही दल बदल (defection in politics) कहा जाता हैं. भारतीय राजनीती में दलबदल की समस्या का प्रभाव कई दशकों से हैं. संसद द्वारा दलबदल रोकने के लिए कई कठोर कानूनों को बनाया हैं, मगर राजनेता किसी तरह अपना जुगाड़ कर ही लेते हैं.

भारत में दल बदल की राजनीति पर निबंध | Dal Badal Essay In Hindiदल बदल की राजनीति पर निबंध | Dal Badal Essay In Hindi

भारत की राजनीति में दल बदल की बात की जाए, तो यह लोकतंत्र का मजाक तब से हो रहा हैं, जब भारत में गणतांत्रिक सरकार का गठन आरम्भ हुआ. शुरूआती दशकों में कांग्रेस ही एकमात्र बड़ी पार्टी थी, इस कारण दल बदल का असर कम था. 1977 में पहली बार विपक्ष मजबूत हुआ, जिसकी वजह दल बदल ही था. इस दौरान पहली गैरकांग्रेसी सरकार जनता दल के नेतृत्व में बनी. इस सरकार के गिरने की वजह भी दल बदल ही था.

तब से लेकर आज तक छोटे से बड़े चुनावों में ये राजनीती का गंदा मजाक ही चल रहा हैं, धीरे धीरे बड़ी संख्या में विधायक व संसद इस दुष्प्रवृति का शिकार होने लगे. दल बदल रोकथाम हेतु भारतीय संसद ने कई कठोर नियम व कानून बनाए हैं. जिससे इस पर कुछ हद तक नियंत्रण हुआ हैं.

संसद ने 32 वें संविधान संशोधन के लिए सबसे पहला प्रयास 1973 में किया, जिसे सरकार पास नही करवा सकी थी. वर्तमान में प्रभाव वाले दल बदल विरोधी कानून 1985 को 52 वें संविधान संशोधन के रूप में लागू कर इस पर नकेल कसी गईं. इस कानून के अनुसार यदि कोई नेता अपनी पार्टी से इस्तीफा देता है, तो उसे संसद अथवा विधानसभा सदस्य के लिए अयोग्य करार दिया जा सकता हैं, साथ ही एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतने के पश्चात वों किसी अन्य दल की सदस्यता लेता हैं तो भी उस नेता को सदन की सदस्यता खोनी पड़ सकती हैं.

2003 के 91 वें संविधान संशोधन द्वारा इस नियम को और अधिक कारगर बनाते हुए यह प्रावधान किया गया, कि यदि किसी राजनैतिक दल से एक तिहाई सदस्य निकलकर किसी नई पार्टी का निर्माण करते हैं. अथवा विधानसभा, लोकसभा या राज्यसभा का कोई सदस्य विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा का सभापति, अध्यक्ष चुने जाने की स्थति में अपने पद से इस्तीफा देने के उपरांत भी उनकी संसद सदस्यता समाप्त नही होगी.

भले ही दल बदल कानून में कुछ संशोधन कर इसे अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास जारी हो, मगर आज भी यह राजनीती का एक खेल बना हुआ हैं. पार्टी से एक तिहाई सदस्य सदस्य जाने के संबंध में कोई तार्किक आधार नही हैं. एक बार किसी नेता के एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीत जाने के बाद वो पार्टी अपने घोषणा पत्र के अनुसार कार्य कर रही हैं अथवा नही, उसके चाहने पर भी पार्टी की सदस्यता को त्याग नही सकता हैं, उसे अगले चुनाव तक उसी पार्टी में रहना पड़ता हैं.

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