आर्यभट्ट पर निबंध | Essay On Aryabhatta In Hindi

आर्यभट्ट पर निबंध Essay On Aryabhatta In Hindi: दोस्तों आपका हार्दिक स्वागत हैं. आज के निबंध About Aryabhatta In Hindi में हम भारत के महान गणितज्ञ आर्यभट्ट (Aryabhatta Life Essay Biography) के जीवन परिचय, जीवनी इतिहास लाइफ उपलब्धियाँ और उनके योगदान को इस निबंध के जरिये समझने का प्रयास करेगे.चलिए Hindi Language में Aryabhatta का Short Essay पढ़ते हैं. 

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Essay On Aryabhatta In Hindi – आर्यभट्ट पर निबंध

आर्यभट्ट का संक्षिप्त परिचय– आर्यभट्ट का जन्म 476 ई में कुसुमपुर पटना में हुआ था. अपनी 23 वर्ष की अवस्था में इन्होने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ आर्यभट्टीयम की रचना की थी.

आर्यभट्ट के बाद के वैज्ञानिकों वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त आदि के कथनों से यह स्पष्ट होता हैं कि इन्होने एक और ग्रंथ की रचना की थी, जिसके ध्रुवांक आर्यभट्टीयम के ध्रुवांक से कुछ भिन्न थे. आर्यभट्ट ने अपने पहले ग्रंथ में युग का आरंभ आधी रात से माना हैं. जबकि दूसरे ग्रंथ में युग का आरंभ सूर्योदय से माना हैं. पहली गन्ना को अर्द्धरात्रिक गणना और दूसरी को औदयिक गणना कहा गया हैं.

आर्यभट्टीयम के सिद्धांत

अपने आर्यभट्टीयम ग्रंथ में कुल 121 श्लोक हैं जो चार खंडों में विभाजित हैं. ये खंड निम्नलिखित हैं.

  • गीतिका पादः
  • गणितपादः
  • कालक्रियापाद
  • गोलपाद

गीतिका पाद– गीतिका पाद में यदपि 11 श्लोक ही हैं. तथापि इन श्लोकों में अत्यधिक सामग्री भरी हुई हैं. इसके सम्बन्ध में गागर में सागर भरने की संज्ञा दी जाती हैं. इसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अंतर्गत स्पष्ट किया जा सकता हैं.

  • अक्षरों के द्वारा संख्या प्रकट करने की नवीन रीति– लम्बी संख्याओं को श्लोक में रखने की दृष्टि से इन्होने अक्षरों के द्वारा संख्या प्रकट करने की नवीन रीति का प्रचलन किया. क से लेकर ह तक के वर्णों का मूल्य इस प्रकार हैं- इस पद्धति के अनुसार क से लेकर म तक के वर्ण क्रमशः १ से लेकर २५ संख्या के द्योतक हैं और य का मूल्य ३० है तथा इसके बाद ह तक के सभी वर्णो के मूल्य में १० की वृद्धि होती गयी हैं.

यथा य =30, र=40, ल= 50, व= 60, श=70, ष=80, स=90 और ह=100.

आर्यभट्ट ने अपनी नवीन रीति का उपयोग किस प्रकार किया इसे निम्न उदाहरण से समझा जा सकता हैं.

  • सिद्धांत– आर्यभट्ट का मूल सिद्धांत है कि पृथ्वी का दैनिक भ्रमण होता है और सूर्य स्वयं स्थिर हैं. एक महायुग में उसके अनुसार सूर्य पृथ्वी का 4,32,000 चक्कर लगाता हुआ माना गया हैं. चन्द्रमा 5,77, 53, 336 और पृथ्वी 1, 58, 22, 37, 500 बार घूमती हुई मानी गयी हैं.
  • महायुगीन भाग्णों चक्करों की संख्या– गीतिकापाद के प्रथम श्लोक में सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, शनि, गुरु, मंगल, शुक्र और बुध के महायुगीन चक्करों की संख्या बताई गयी हैं.
  • पृथ्वी के घुर्णन की संख्या– आर्यभट्ट ने इस भाग में एक महायुग में पृथ्वी के घूर्णन की संख्या भी दी है, क्योंकि उन्होंने पृथ्वी का दैनिक भ्रमण माना हैं.

गणितवाद– आर्यभट्ट के ग्रंथ आर्यभट्टीय का दूसरा भाग गणितपाद का हैं. इसमें उन्होंने अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के प्रश्न दिए हैं इस भाग में 30 श्लोक हैं. इन श्लोकों में उन्होंने गणित सम्बन्धी अनेक कठिन प्रश्नों को दिया हैं यथा.

  1. प्रथम श्लोक में अपना नाम और स्थान बताया हैं.
  2. दूसरे श्लोक में संख्या लिखने की दशमलव पद्धति की इकाइयों के नाम हैं.
  3. शेष श्लोकों में वर्ग, वर्गक्षेत्र, घन, घनफल, वर्गमूल, घनमूल, त्रिभुज, त्रिभुज का क्षेत्रफल, शंकु का घनफल, वृत का क्षेत्रफल, उसका घनफल, विषम चतुर्भुज का क्षेत्रफल सब प्रकार के क्षेत्रों की मध्यम लम्बाई चौड़ाई जानकर क्षेत्रफल निकालने के साधरण नियम दिए गये हैं.

कालक्रियापद– आर्यभट्टीयम ग्रंथ के कालक्रियापाद नाम खंड में ज्योतिष सम्बन्धी बातों का वर्णन हैं. इसमें काल और कोण की इकाइयों का सम्बन्ध तथा मास, वर्ष और युगों के सम्बन्ध को भी बताया गया हैं. इस ग्रंथ में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से युग, वर्ष, मास, वर्ष और युगों के सम्बन्ध को भी बताया गया हैं.

गोलपाद– आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभटीयम के अंतिम खंड को गोलपाद के नाम से अभिहित किया हैं इसमें 50 श्लोक हैं. इसमें सूर्य ग्रह तथा नक्षत्रों के सम्बन्ध में वर्णन किया गया हैं.

आर्यभट्ट का योगदान

उपर्युक्त सिद्धांतों के आधार पर आर्यभट्ट के योगदान को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता हैं.

  • ज्योतिष सिद्धांतों की विवेचना– आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ में ज्योतिष सिद्धांत की प्रायः सभी बातें और उच्च गणित की कुछ बातें सूत्र रूप में लिपिबद्ध की हैं.
  • आर्यभटीयम पर अनेक टीकाओं की रचना– अनेक टीकाएँ वर्तमान में आर्यभटीयम ग्रंथ के ऊपर लिखी गयी हैं, जो इसके महत्व को परिभाषित करती हैं.
  • बीजगणित के जनक– भारत में आर्यभट्ट प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने ज्योतिष सिद्धांत में निश्चित रूप से एक गणित के अध्याय को समाविष्ट किया हैं. इसमें अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित के सूत्रों व सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया हैं. आर्यभट्ट को बीजगणित का जनक माना गया हैं.
  • पाई का मान ज्ञात करना– आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि की अनुमानतः माप की थी, वह आज तक सही मानी जाती हैं. आर्यभट्ट ने पाई का मान 3.1416 बताया था जो आधुनिक पद्धतियों से निकाले गये मान से बहुत निकट हैं.
  • पृथ्वी गोल है– पृथ्वी गोल है तथा अपनी धुरी पर चलती है, के सिद्धांतों के प्रतिपादन का श्रेय आर्यभट्ट को ही हैं.
  • सूर्य और चन्द्र के विषय में पौराणिक धारणाओं का खंडन करना– आर्यभट्ट ने सूर्य और चन्द्र के विषय में पौराणिक धारणाओं का खंडन किया है और कहा है कि ग्रहण में राहू केतू का कोई स्थान नहीं है बल्कि यह चन्द्रमा और पृथ्वी की छाया का फल हैं.
  • दशमलव प्रणाली की खोज– आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम दशमलव प्रणाली की खोज की, जिसने उन्हें विश्व प्रसिद्ध कर दिया. इससे संख्या का विस्तार सीमित हो गया.

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