पाबूजी राठौड़ का इतिहास | history of pabuji rathore in hindi

history of pabuji rathore in hindi पाबूजी राठौड़ कोल्हुगढ़ के रहने वाले थे. चांदा और डामा दो वीर इनके प्रिय सहयोगी थे. जब पाबूजी युवा हुए तो अमरकोट के सोढा राणा के यहाँ से सगाई का नारियल आया. सगाई तय हो गई. पाबूजी ने देवल नामक चारण देवी को बहन बना रखा था. देवल के पास एक बहुत सुन्दर और सर्वगुण सम्पन्न घोड़ी थी. जिसका नाम था केसर कालवी .

पाबूजी राठौड़ का इतिहास | history of pabuji rathore in hindi

देवल अपनी गायों की रखवाली इस घोड़ी से करती थी इस घोड़ी पर जायल के जिंदराव खिचीं की आँख थी. वह इसे प्राप्त करना चाहता था. जींदराव और पाबूजी में किसी बात को लेकर मनमुटाव भी था. विवाह के अवसर पर पाबूजी ने देवल देवी से यह घोड़ी मांगी. देवल ने जिंदराव की बात बताई. तब पाबू ने कहा कि आवश्यकता पड़ी तो वह अपना कार्य छोड़कर बिच में ही आ जायेगे. देवल ने घोड़ी दे दी.

बारात अमरकोट पहुची. जिंदराव ने मौका देखा और देवल देवी की गायें चुराकर ले भागा. पाबूजी जब शादी के फेरे ले रहे थे. तब देवल के समाचार पाबू को मिले कि जिंदराव उनकी गायें लेकर भाग गया है. समाचार मिलते ही अपने वचन के अनुसार शादी के फेरों को बिच में ही छोड़ कर केसर कालवी घोड़ी पर बैठकर जिंदराव का पीछा किया.

गायों को तो छुड़ा लिया लेकिन पाबूजी खेत में ही रहे. अर्धविवाहित सोढ़ी पाबूजी के साथ सती हो गई. इनकी यह यशगाथा पाबूजी की फड़ में संकलित है, जिसका वाचन बड़ा लोकप्रिय है. तथा पाबूजी की लोकदेवता के रूप में पूजा की जाती है.

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