पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं निबंध | Paradhin Sapnehu Sukh Nahi Essay In Hindi

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं निबंध | Paradhin Sapnehu Sukh Nahi Essay In Hindi:- यह सूक्ति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्त्रियों के सन्दर्भ में व्यक्त की गई है. स्त्रियों की पराधीनता की स्थिति इतनी दयनीय मानी जाती थी कि उन्हें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के नियंत्रण में रहने का न केवल सुझाव दिया जाता था, बल्कि इसे अनिवार्य माना जाता था. स्त्रियों का पूरा जीवन पराधीनता से इस प्रकार जकड़ा हुआ था कि वे अपने किसी कार्य या व्यवहार के लिए स्वतंत्र नहीं थी.paradhin sapne hun sukh nahi लोकोक्ति/ सूक्ति पर निबंध बता रहे हैं.

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स्त्रियों के मस्तिष्क में पराधीनता की भावना इस हद तक घर कर गई थी कि वे अपने सपने में भी अपनी स्वतंत्रता का आनन्द नहीं उठा सकती थी. तुलसीदास जी ने इसी सन्दर्भ में उक्त सूक्ति के द्वारा स्त्रियों की दारुण स्थिति का चित्रण किया है. स्त्रियों के सन्दर्भ में कही गई उक्त उक्ति सामान्य जनों पर भी लागू हो सकती है. स्रष्टि में विद्यमान सभी जीव जन्तु अपनी स्वतंत्रता से अत्यधिक प्रेम करते हैं.

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पिंजरे में कैद चिड़िया हो या सलाखों से घिरा शेर, एक नवजात शिशु हो या अत्यंत कमजोर वृद्ध. किसी भी जीव में थोड़ी सी भी चेतना है तो वह अपनी स्वतंत्रता से अत्यधिक प्रेम करता हैं. वह प्रत्येक आयाम या सभी पक्षों में स्वतंत्र होना चाहता हैं. वह विचारो की स्वतंत्रता चाहता है, उसे अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता चाहता है. कार्य करने की स्वतंत्रता प्रिय है तो उस कार्य की सफलता से उत्पन्न आनन्द के उपभोग की स्वतंत्रता भी उसे वांछनीय हैं.

इन तमाम स्वतंत्रताओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मूलभूत है. अभिव्यक्ति की इच्छा किसी भी व्यक्ति की भावनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन से प्रेरित होती हैं, और अपनी अपनी क्षमता के अनुरूप होती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अभिप्रायः दो प्रकार के संवादों से होता है.

मिडिया द्वारा सूचनात्मक एवं वैयक्तिक स्तर पर विचारों का प्रकाशन. लोकतंत्र में मिडिया दोहरी भूमिका निभाता है, एक और वह रचनात्मक प्रवृति के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो दूसरी ओर जनमत से सरकार को परिचित कराता है तथा सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों से वह जनता को परिचित कराता है.

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं पर निबंध | Essay on there is No Pleasure

वैयक्तिक स्तर पर विचारों की अभिव्यक्ति से तात्पर्य युक्तियुक्त अभिव्यक्ति से है. निरपेक्ष स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता है. स्वतंत्रता हमेशा प्रतिमानों मे निहित होती है. विश्व के किसी भी देश का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ ऐसी हिदायतों के साथ देता है, जिससे देश की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता नकारात्मक रूप से प्रभावित न हो. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की निर्दोषता या सदोषता कभी स्पष्टः निरपेक्ष नहीं हो सकती है, पूर्ण नहीं हो सकती.

जो मानदंड आज उचित एवं प्रासंगिक लगते है, वही अनिवार्य रूप से भविष्य के लिए भी उचित एवं प्रासंगिक नहीं हो सकते, विचारों एवं दृष्टिकोणों के साथ साथ सामाजिक मापदंड बदलते है. अभिव्यक्ति या किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सम्बन्ध स्वावलंबन से होता है. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं उक्ति जहाँ एक ओर यह स्पष्ट करती है कि पराधीन व्यक्ति को सपने में भी सुख प्राप्त नही होता है, वही इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि किसी भी प्रकार के सुख की प्राप्ति के लिए स्वाधीनता अर्थात स्वावलंबन अपरिहार्य हैं.

पराधीनता पर निबंध | Essay on Dependence in Hindi

हितोपदेश में यह भी कहा गया है कि पराधीन को यदि जीवित कहते है तो मृत कौन, अंग्रेजी में भी एक लोकप्रिय उक्त का अनुवाद हैं कि स्वर्ग में दास बनकर रहने की अपेक्षा नर्क में स्वाधीन शासन करना अधिक बेहतर है. वास्तव में पराधीनता केवल राजनीतिक नहीं बल्कि मानसिक बौद्धिक एवं आर्थिक भी होती हैं.

जब कोई व्यक्ति दूसरों के विचारों से प्रभावित होने या दूसरों के विचारों का अनुसरण करने के लिए बाध्य हो जाए यप यह भी पराधीनता का ही सूचक है. स्वाधीनता से सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती हैं. जबकि पराधीनता मनुष्य के स्वाभिमान को नष्ट कर देती हैं. पराधीनता से बचने का एकमात्र मार्ग आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास है, जिसे संघर्ष द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता हैं.

एक स्वाधीन व्यक्ति की ही सोच रचनात्मक हो सकती है जो पराधीन है, जिसकी आत्मा दुखी एवं दबी हुई होती है, वह व्यक्ति अपनी पूर्ण सृजनात्मक क्षमता का उपयोग कैसे कर सकता है. इसलिए एक पराधीन राष्ट्र के लोगों की सोच पिछड़ी एवं नकारात्मक होती है. क्योंकि उनकी मानसिकता पराधीन या दास प्रवृति की होती है. जबकि दूसरी ओर स्वाधीन देश के सदस्यों में रचनात्मक ऊर्जा का अक्षय स्रोत होता है.

वे क्रियात्मक रूप से अधिक सक्रिय एवं जीवंत होते है. सोच एवं दृष्टिकोण अत्यधिक रचनात्मक होने के कारण राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान अत्यंत प्रभावी एवं उल्लेखनीय होता है. इसी कारण स्वाधीन राष्ट्र का विकास एवं प्रगति अत्यंत तीव्र गति से निरंतर होता जाता हैं.

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