पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं निबंध | Paradhin Supnehu Sukh Nahi Essay In Hindi

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं निबंध | Paradhin Supnehu Sukh Nahi Essay In Hindi:- यह सूक्ति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्त्रियों के सन्दर्भ में व्यक्त की गई है. स्त्रियों की पराधीनता की स्थिति इतनी दयनीय मानी जाती थी कि उन्हें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के नियंत्रण में रहने का न केवल सुझाव दिया जाता था, बल्कि इसे अनिवार्य माना जाता था. स्त्रियों का पूरा जीवन पराधीनता से इस प्रकार जकड़ा हुआ था कि वे अपने किसी कार्य या व्यवहार के लिए स्वतंत्र नहीं थी. Paradhin Supnehu Sukh Nahi लोकोक्ति/ सूक्ति पर निबंध बता रहे हैं.

Paradhin Supnehu Sukh Nahi Essay In Hindi

Paradhin Supnehu Sukh Nahi Essay In Hindi

स्त्रियों के मस्तिष्क में पराधीनता की भावना इस हद तक घर कर गई थी कि वे अपने सपने में भी अपनी स्वतंत्रता का आनन्द नहीं उठा सकती थी. तुलसीदास जी ने इसी सन्दर्भ में उक्त सूक्ति के द्वारा स्त्रियों की दारुण स्थिति का चित्रण किया है. स्त्रियों के सन्दर्भ में कही गई उक्त उक्ति सामान्यजनों पर भी लागू हो सकती है. स्रष्टि में विद्यमान सभी जीव जन्तु अपनी स्वतंत्रता से अत्यधिक प्रेम करते हैं.

Short essay in hindi पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

भारत की पराधीनता : एक काल खंड में हमारा भारत देश सोने की चिड़ियाँ कहलाता था. यहाँ सम्रद्धता थी. मानवीय मूल्यों के रक्षक के रूप में हमारी पहचान थी. उसी उदारता और वैश्विक कुटुंब की अवधारणा ने भारत को सदियों की पराधीनता की ओर धकेल दिया.

दो सौ वर्षों की गुलामी ने सब कुछ बदल दिया, समाज के संस्कार, मूल्य हमारी व्यवस्थाएं. यही वजह थी कि स्वतंत्रता के समय एक समय का सबसे विकसित राष्ट्र दुर्बल और कमजोर हालात में था. पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने में कई दशकों का संघर्ष चला हजारों सेनानियों ने अपना जीवन न्यौछावर किया तब जाकर एक विदेशी व्यवस्था की पराधीनता का अंत हुआ. आज मेरे भारत को आजाद हुए 75 वर्ष हो गये है मगर पराधीनता की उन दो सदियों की छाप आज भी हमारी संस्कृति, भाषा और विचारों में देखने को मिलती हैं.

सुख दुःख को भली भांति वही व्यक्ति समझ सकता हैं, जिन्होंने इसे भोगा हो, ठीक ऐसा ही पराधीनता के विषय में हैं. भला भारत और भारत के लोगों से बेहतर इसे कौन समझ सकता हैं. उन गुलामी की बेड़ियों का जीवन कैसा होता हैं. पराधीनता के उस दौर ने एक राष्ट्र के रूप भारत को कई सबक दिए जिनसे हमें सीखना चाहिए, ताकि आने वाले भविष्य में वो गलतियाँ पुनः न दोहराई जाए.

तुलसीदास जी ने पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं, सोच विचार देख मनमाही यह उक्ति उस समय लिखी थी, जब भारत गोरो का गुलाम था. हमें उनके विचारों पर चिंतन करना चाहिए, क्योंकि यदि एक अभिशिप्त राष्ट्र यदि अपनी अतीत की गलतियों और भोगे के दुःख का विवेचन नहीं करता हैं तो ऐसा दूसरी बार होना भी संभव हैं. एक राष्ट्र के रूप में हमें यह विचार करना होगा कि अंग्रेजों की पराधीनता किसी तरह समाप्त हो चुकी हैं.

आज हमारा राष्ट्र स्वतंत्र है देश के प्रत्येक वर्ग ने पराधीनता के दुष्परिणाम झेले हैं. ऐसे में अब सभी को स्वतंत्रता रुपी अमृत का लाभ भी बराबरी से मिलना चाहिए. देश के अति पिछड़े वर्ग हो अथवा नारी आज हमें इन्हें पराधीनता की बेड़ियों में नहीं रखना चाहिए. साथ ही भारतीय समाज को भी चिन्तन करना चाहिए अपनी मानसिक पराधीनता का जो अंग्रेजों के जाने के सात दशक बाद भी विद्यमान हैं.

पश्चिम के विचार आज भी हमारे मस्तिष्क पर हावी हैं हम किसी तरह आज भी अंग्रेज बनकर जीने के भरसक प्रयास करते हैं. अपने बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा दिलाने की बजाय अंग्रेजी में पढ़ाना चाहते हैं. हमारा पहनावा भी कुछ उसी तरह का होने लगा हैं. पराधीनता का दौर तो समाप्त हो चूका हैं फिर हम क्यों गुलामी के प्रतीकों के सम्मान की खातिर अपना जीवन खफा रहे हैं.

हजारों वर्ष पुरानी हमारी भारतीय संस्कृति में हमें खराबी ही खराबी क्यों नजर आती हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपनी जड़ों से कट चुके है तथा आज भी गुलामी की मानसिकता के उस चश्में से समाज को देखते हैं. जिसमें अंग्रेजों ने हीन भावना भरने के सारे प्रयास किये थे. स्वाधीनता का ये महज झूठा अनुभव ही हैं, हम आज भी मानसिक पराधीनता के शिकार हैं. हमारी सारी व्यवस्थाएं आज भी अंग्रेजों के बनाएं कानूनों के मुताबिक़ चलती हैं.

पराधीनता के कारण विकास में बाधा

आमतौर पर पराधीनता व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के जीवन पर बहुआयामी प्रभाव छोड़ती हैं. सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, बौद्धिक, वैचारिक, शैक्षिक और धार्मिक तरह से अपनी छाप छोड़ती हैं. पराधीनता सबसे बड़ा असर मानसिक रूप से करती हैं. यह व्यक्ति में हीन भावना को भरकर उसके स्वाभिमान को चूर चूर कर देती हैं.

उसी हीन भावना के कारण धीरे धीरे इंसान में साहस, गर्व और आत्मानुभूति के भाव समाप्त हो जाते हैं. और ग्लानि के कारण उसका जीवन नीरस बन जाता हैं. पराधीन व्यक्ति कभी बड़े सपने नहीं देखने का साहस कर पाता हैं. उसे जो कुछ मिलता हैं या दिया जाता हैं उसमें ही संतुष्ट हो जाता हैं.

विवेक, चिंतन आदि के मुक्त व्यक्ति की सोच में निकृष्टता और अकर्मण्यता जन्म ले लेती हैं. कुछ नया करने या सृजनात्मक विचारों से बहुत दूर जाते हैं. पराधीनता की स्थिति एक व्यक्ति से शुरू होकर समाज और अन्तोगत्वा राष्ट्र को पतन की ओर धकेल देती हैं.

समाज को पथभ्रष्ट और अमानवीय नैतिक कर्मों की ओर धकेलने में भी पराधीनता का हाथ रहा हैं. भारतीय समाज व परिवेश में एक डेढ़ सदी तक लूटमार, डकैती, हिंसा, चोरी और हत्याओं का दौर चला था. इन अमानवीय सोच की जनक गुलामी ही थी जो समाज में पीड़ित जनों में विद्रोह के भाव को जन्म देती थी.

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