Social Problems In India- Essay On Our Social Problems In Hindi/भारत की सामाजिक समस्याएँ पर निबंध

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Social Problems In India- Essay On Our Social Problems In Hindi/ भारत की सामाजिक समस्याएँ पर निबंधSocial Problems In India

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं. समाज में रहते हुए उसे समाज द्वारा बनाए गये नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करना होता हैं. यदि वह ऐसा नही करता हैं, तो इससे सामाजिक मूल्यों (Social values) का हास होता हैं. साथ ही हमारे समाज व देश में बहुत सारी सामाजिक समस्याओं (Our Social Problems In India) को पनपने का मौका भी मिलता है.

धार्मिक कट्टरता, जाति प्रथा, अंधविश्वास, नारी शोषण, दहेज प्रथा, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि मुख्य Our Social Problems (सामाजिक समस्याए) हैं.ऐसा नही हैं, कि ये सामाजिक समस्याएं हमेशा से हमारे समाज में विद्यमान रही.

major Social Problems List In India

कुछ सामाजिक समस्याओं की जड़ हमारी सामाजिक कुरीतियाँ हैं, तो कुछ ऐसी समस्याएं भी हैं, जिन्होंने सदियों की गुलामी के बाद समाज में अपनी जड़े स्थापित कर ली. जबकि कुछ समस्याओं के मूल में दूसरी समस्याएं हैं. आइए, कुछ उल्लेखनीय सामाजिक समस्याओं के निबंध में विस्तार से इन्हें जानते हैं.

धार्मिक कट्टरता- 

इतिहास साक्षी हैं, कि अनेक धर्मों, जातियों एवं भाषाओं वाला यह देश अनेक विसंगतियों के बावजूद सदा एकता के सूत्र में बंधा रहा. यहाँ अनेक जातियों का आगमन हुआ और उनकी परम्पराएँ, विचारधाराएं और संस्कृति इस देश के साथ एक रूप हो गईं. इस देश के हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई सभी परस्पर प्रेम से रहना चाहते हैं. लेकिन भ्रष्ट राजनेता उन्हें बांटकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे रहते हैं. कहा जा सकता हैं, कि धार्मिक कट्टरता के मूल में कुछ स्वार्थी लोगो का हाथ हैं.

जाति प्रथा- 

प्राचीन काल में हमारे देश में गुण एव कर्म के अनुसार वर्ण-व्यवस्था का निर्धारण किया गया था एक व्यक्ति जो मंदिर में पूजा कराता एव बच्चो को शिक्षा प्रदान करता था वह वह ब्राह्मण कहलाता था, जबकि उसी का बेटा समाज की रक्षा के कार्य में सलग्न रहता था, तो उसे क्षत्रिय माना जाता था. अर्थात जाति निर्धारण का आधार व्यक्ति का कर्म था. किन्तु समय के अनुसार वर्ण व्यवस्था विकृत हो गईं और जाति निर्धारण का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया. फिर धीरे-धीरे उंच नीच, छुआछूत इत्यादि सामाजिक बुराइयों ने अपनी जड़े जमा ली. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जाति प्रथा हमारे समाज के लिए तब अभिशाप बन गई, जब क्षुद्र तथा स्वार्थी राजनेताओं ने जातिवाद की राजनीति कर हमारी एकता एवं अखंडता को चोट पहुचाना शुरू कर दिया. जातिवाद समाज के विघटन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार रहा हैं.

अंधविश्वास-

धर्म एवं ईश्वर की आड़ में कुछ लोग गरीब एवं भोली भाली जनता को मुर्ख बनाते हैं. समाज में अंधविश्वास के मूल में धार्मिक आडम्बर एवं ईश्वर का भय ही हैं. भूत प्रेत, ईश्वर   के नाम पर चढ़ावा एवं बलि ये सब अंधविश्वास के ही रूप हैं. इसके कारण सामाजिक प्रगति बाधित होती हैं.

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