तात्या टोपे के बारे में जानकारी | Tatya Tope Information In Hindi

तात्या टोपे के बारे में जानकारी Tatya Tope Information In Hindi : वतन की खातिर कुबार्नी देने की भारत में अटल परम्परा रही हैं, सदियों तक अंग्रेजों के साथ चली देश के क्रांतिकारियों की जंग में हजारो वीरों को अपना बलिदान देना पड़ा था उन्ही में से एक थे तात्या टोपे. 1857 में अंग्रेजों से पहली आजादी की जंग लड़ने वाले वीरों में झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे और नाना साहब का नाम अवश्य ही लिया जाता हैं. Tatya Tope शहीद दिवस 2019 पर हम आपकों उनके जीवन परिचय इतिहास, जीवनी परिवार के बारें में संक्षिप्त बायोग्राफी उपलब्ध करवा रहे हैं.

Tatya Tope Information In Hindi

तात्या टोपे के बारे में जानकारी Tatya Tope Information In Hindi

पूरा नाम – रामचंद्र पांडुरंग येवलकर
उपनाम – तात्या टोपे
जन्म – 1814
स्थान –  येवला गाँव (नासिक)
माता-पिता  – पिता पांडुरंग त्रयम्बक और माता रुक्मिणी बाई
मृत्यु – 18 अप्रैल 1859

Details About Tatya Tope

short story about Tatya Tope Biography in Hindi tatya tope information in marathi slogan essay Details: तात्या टोपे का जन्म सन 1814 में हुआ था, उनका पूरा नाम रघुनाथ राव पांडु यवलेकर था. सन 1818 में पेशवाई सूर्य अस्त हो चुका था. अंग्रेजों द्वारा पेशवा बाजीराव को आठ लाख रूपये पेंशन देकर कानपुर के निकट बिठूर भेज दिया था.

उस समय बालक रघुनाथ की अवस्था मात्र चार वर्ष की थी. पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब के साथ ही इनका लालन पोषण हुआ. नाना साहब के बाल सखा होने के कारण दोनों में अटूट प्रेम था, यही कारण था कि क्रांति के समय भी तात्या टोपे पेशवा के दाहिने हाथ बने रहे.

जून 1858 से लेकर 1859 तक तात्या टोपे अंग्रेजों के विरुद्ध पूरी शक्ति से लड़ते रहे, कभी उनके पास तोपें होती तो कभी एक बंदूक भी नहीं राहत. सेना के नाम पर मुट्ठी भर साथी ही रह जाते.

ग्वालियर की पराजय के बाद तात्या टोपे उबड़ खाबड़ भूभागों में अंग्रेजी सेना का सामना करते रहे. बिना युद्ध सामग्री के बिना किसी विश्राम के अपनी सेना सहित एक स्थान से दुसरे स्थान पर अंग्रेजी सेना को छकाते हुए तात्या टोपे घूमते रहे.

सीकर के युद्ध के बाद तात्या का भाग्य सूर्य अस्त हो गया. राव साहब और फिरोजशाह उनका साथ छोड़ गये. निरुपाय होकर उन्होंने तीन चार साथियो के साथ नरवर राज्य में पारोंण के जंगल में अपने मित्र मानसिंह के पास जाकर चरण ली.

7 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे राजा मानसिंह के विश्वासघात के कारण मेजर मीड द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये. उस समय उनके पास एक घोडा, एक खुखरी और सम्पति के नाम पर ११८ मुहरें थी. बंदी अवस्था में तात्या टोपे को सीप्री लाया गया. वहां उन पर एक सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन्हें प्राणदंड दिया गया.

18 अप्रैल 1859 की शाम 5 बजे तात्या टोपे को फांसी के तख्ते पर लाया गया, वहां अपने आप ही फांसी के तख्ते पर चढ़ गये और अपने ही हाथों फांसी का फंदा गले में डाल दिया और भारत माता का यह रणबांकुरा फांसी के फंदे पर झूल गया. (स्रोत)

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