सहकारिता पर निबंध | Essay on Co-operative Movement in India in Hindi

नमस्कार आज का निबंध सहकारिता पर निबंध Essay on Co-operative Movement in India in Hindi पर दिया गया हैं. आज हम पढ़ेगे कि सहकारिता क्या है इसका अर्थ महत्व और भारत में सहकारिता आंदोलन के इतिहास पर सरल भाषा में स्टूडेंट्स के लिए यहाँ निबंध दिया गया हैं.

सहकारिता पर निबंध Essay on Co-operative Movement in Hindi

सहकारिता पर निबंध Essay on Co-operative Movement in India in Hindi

मिल जुल कर बड़े से बड़ा काम आसानी से किया जा सकता है. सभी का विकास तभी हो सकता है. जब हम अपना लाभ छोड़कर सबके लाभ के लिए कार्य करे.

यह सहयोग की भावना से ही संभव है, इस तरह मिलजुलकर कार्य करना ही सहकारिता (Co-operative) का आधार है. भारत में सहकारिता आंदोलन में हम कोआपरेटिव का महत्व, इसके लाभ इतिहास अर्थ व परिभाषा तथा सिद्धांत पर यह निबंध भाषण तैयार किया गया है.

सहकारिता का अर्थ एवं महत्व (cooperate meaning & Importance in Hindi)

साधारण शब्दों में संगठित रूप से व्यक्ति आपसी सहयोग के साथ जो कार्य करते है, उसे हम सहकारिता कहते है. अकेले व्यक्ति के पास इतने साधन नही होते है,

कि वह अपना आर्थिक विकास स्वयं कर सके. यदि लोग आपस में संगठित होकर किसी कार्य को करते है, तो बड़े से बड़ा मुश्किल काम आसान बन जाता है.

इस प्रकार लोग आपस में मिलकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने व विकास का प्रयास करते है. सहकारिता में समाज के निर्धनतम एवं कमजोर व्यक्ति का हित भी निहित होता है. सहकारिता का नारा ‘एक सबके लिए, सब एक के लिए’ इसके महत्व को दर्शाता है.

सहकारिता के मूल सिद्धांत (Basic principles of co-operation)

  1. सहकारिता में सदस्यता स्वैच्छिक होती है.
  2. इसका संचालन एवं प्रबंधन सभी सदस्यों की सहमती से होता है.
  3. सभी सदस्यों को एक जैसे अधिकार व अवसर प्राप्त होते है.
  4. इसमें आर्थिक उद्देश्य के साथ साथ नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों को भी शामिल किया जाता है.

सहकारिता का मूलमंत्र है- ”एक सब के लिए, सब एक के लिए” और सबके हित में ही हमारा हित है.

सहकारी समिति का गठन (how to form a cooperative)

किन्ही समान आर्थिक या सामाजिक हित वाले क्रिया-कलापों के उद्देश्य से कम से कम 15 व्यक्ति मिलकर एक प्राथमिक सहकारी समिति का गठन कर सकते है.

वे उस कार्य के लिए अपने साधन या पूंजी समिति में लगाते है. समिति का पंजीकरण सहकारिता विभाग से करवाया जाता है.

इसका संचालन सदस्यों में से ही चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा होता है. समिति के सभी सदस्य मिलकर कार्य करते है. समिति के आय व्यय का उचित तरीके से हिसाब किताब रखा जाता है. समिति अन्य स्थानों से भी ऋण व सहायता प्राप्त कर सकती है.

लाभ-हानि में सभी सदस्य सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते है. अपने उद्देश्यों के अनुसार सहकारी समितियाँ (Co-operative types) निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है.

  • कृषि सहकारी समिति (Agricultural co-operative society)
  • दुग्ध सहकारी समिति (Milk co-operative society)
  • उपभोक्ता सहकारी समिति (Consumer co-operative society)
  • गृह निर्माण सहकारी समिति (Housing construction co-operative society)
  • सहकारी साख एवं बचत समिति (Co-operative credit and savings committee)
  • क्रय विक्रय सहकारी समिति (Purchasing sale co-operative society)

हमें दैनिक उपयोग के लिए कई तरह का सामान खरीद्ना पड़ता है.कई बार व्यापारियों द्वारा हमे नकली व घटिया सामग्री दे दी जाती है.

जानकारी के अभाव में हमें इस प्रकार का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. अगर हमें उपभोक्ता के हितों सम्बन्धी अधिकारों के बारे में जानकारी हो तो इस नुकसान से बचा जा सकता है.

विश्व एवं भारत में सहकारिता का इतिहास (history of cooperatives in india & world)

सहकारिता आंदोलन सदस्यों का, सदस्यों द्वारा, सदस्यों के लिए संचालित कार्यक्रम है. विश्व में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत इंग्लैंड के लंकाशायर में हुई, यहाँ पर रोबर्ट ओवन द्वारा सहकारी उपभोक्ता भंडार प्रारम्भ किया गया.

तत्पश्चात हरसन शुल्ज डेलिश एवं फैडरिक विलियम रेफेजन ने जर्मनी में सहकारिता आंदोलन का सूत्रपात किया.

भारत में सहकारिता आंदोलन का प्रारम्भ दुर्भिक्ष आयोग से माना जाता है. जिसकी अनुशंसा पर ”सहकारी साख अधिनियम 1904” पारित किया गया. 1919 के अधिनियम में सहकारिता को प्रांतीय विषय बना दिया गया.

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान में इसे राज्य सूची में स्थान दिया गया. सहकारी समितियों की देखरेख तथा सहकारिता विकास के लिए भारत में राज्य सहकारिता विभाग कार्यरत है.

यह विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर, सहकारी समिति के सदस्यों की कार्यकुशलता को बढ़ाता है. सहकारिता विभाग, सहकारी समितियों का मार्गदर्शन करता है.

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