जनहित याचिका पर निबंध | Essay On Public Interest Litigation In Hindi

जनहित याचिका पर निबंध Essay On Public Interest Litigation In Hindi: जनहित याचिका को अंग्रेजी में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन कहते है इन्हें संक्षिप्त में PIL भी कहा जाता हैं. जनहित याचिका क्या होती है इसकी शुरुआत कब हुई उद्देश्य तथा भारत में Public Interest Litigation की क्या व्यवस्था हैं. इस सम्बन्ध में यहाँ  Public Interest Litigation Essay आपकों बता रहे हैं.

जनहित याचिका निबंध Essay On Public Interest Litigation In Hindi

जनहित याचिका निबंध Essay On Public Interest Litigation In Hindi

जनहित याचिका क्या है कब और कैसे इसकी शुरुआत हुई

जनहित याचिका का प्रारम्भ – कानून की सामान्य प्रक्रिया में कोई व्यक्ति तभी अदालत जा सकता है जब उसका कोई व्यक्ति गत नुकसान हुआ हो इसका अर्थ यह हैं कि अपने अधिकार का उल्लंघन होने  या किसी विवाद में फंसने पर कोई व्यक्ति न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता हैं. 1979 में इस अवधारणा में परिवर्तन आया.

1979 में न्यायालय ने एक ऐसे मुकदमे की सुनवाई करने का निर्णय किया जिसे पीड़ित लोगों ने नहीं बल्कि उनकी ओर से दूसरों ने दाखिल किया. 1979 में समाचार पत्रों में विचारधीन कैदियों के बारे में यह खबर छपी कि उन्हें सजा भी दी गई होती तो उतनी अवधि की नहीं होती जितनी अवधि उन्होंने विचाराधीन होते हुए काट ली हैं.

इस खबर को आधार बनाकर एक वकील के एक याचिका दायर की. सर्वोच्च न्यायालय ने यह याचिका स्वीकार कर ली. सर्वोच्च न्यायालय में यह मुकदमा चला यह याचिका जनहित याचिका के रूप में प्रसिद्ध हुई इस प्रकार 1979 से इसकी शुरुआत सर्वोच्च न्यायालय ने की. बाद में इसी प्रकार के अन्य अनेक मुकदमों को जनहित याचिकाओं का नाम दिया गया.

जनहित याचिका का महत्व

वर्ष 1980 के बाद जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामलो में भी रूचि दिखाई है जहाँ समाज के कुछ वर्गों के लोग अर्थात गरीब लोग आसानी से अदालत की शरण नहीं ले सकते इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए न्याया लय ने जन सेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को समाज के जरुरतमन्द और गरीब लोगों की ओर से याचिकाएं दायर करने की इजाजत दी हैं.

इससे ऐसे मुकदमों की संख्या में वृद्धि हुई हैं. जिनमें जन सेवा की भावना रखने वाले नागरिकों ने गरीबों के के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जनहित याचिका दायर कर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की मांग की. गरीबों का जीवन सुधारने के लिए गरीब व्यक्तियों के अधिकारों की पूर्ति करने के लिए, शोषण के विरुद्ध अपराध को अर्थपूर्ण बनाने के लिए बंधुआ मजदूरों की मुक्ति तथा लडकियों से देह व्यापार को रोकने आदि अनेक प्रकार के शोषण को रोकने के लिए स्वयंसेवी संगठन जनहित याचिकाओं के द्वारा न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग कर सकते हैं.

न्यायालय इन शिकायतों को आधार बनाकर उन पर विचार शुरू करता हैं और पीड़ित व्यक्तियों को शोषण से छुटकारा दिलाता हैं. इन जन याचिकाओं के प्रचलन से यदपि न्यायालयों पर कार्यों का बोझ बढ़ा हैं. परन्तु इनसे गरीब लोगों को लाभ पहुंचा हैं इसने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया हैं. इससे कार्यपालिका जवाबदेह बनने पर बाध्य हुई हैं. अनेक बंधुआ मजदूरों को शोषण से बचाया गया है तथा खतरनाक कामों में बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाया गया हैं.

जनहित याचिका में न्यायालय की भूमिका

जनहित याचिकाएँ न्यायिक सक्रियता का प्रभावी साधन सिद्ध हुई हैं, इस सम्बन्ध में न्यायालय की भूमिका निम्न रूपों में प्रकट हुई हैं.

  1. पीड़ित लोगों के हित के लोगों की याचिकाओं को स्वीकार करना– सबसे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने पीड़ित लोगों की ओर से दूसरे लोगों द्वारा की गई याचिकाओं को स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया. ऐसी याचिकाओं को जनहित याचिकाएं कहा गया. 1979 के बाद से ऐसे मुकदमों की बाढ़ सी आ गई जिसमें जनसेवा की भावना रखने वाले नागरिकों एवं स्वयंसेवी संगठनों के अधिकारों की रक्षा गरीबों के जीवन को और बेहतर बनाने, पर्यावरण की सुरक्षा और लोकहित से जुड़े अनेक मुद्दों पर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की मांग की गई.
  2. न्यायिक सक्रियता– किसी के द्वारा मुकदमा करने पर उस मुद्दे पर विचार करने के साथ साथ न्यायालय में अखबार में छपी खबरों और डाक से शिकायतों के आधार बनाकर उन पर भी विचार करना शुरू कर दिया. न्यायपालिका की यह नई भूमिका न्यायिक सक्रियता के रूप में लोकप्रिय हुई.
  3. समाज के जरूरतमंद और गरीब लोगों की ओर से सामाजिक संगठनों व वकीलों की याचिकाएं स्वीकार– 1980 के बाद से न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिकाओं के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामलों में भी रूचि दिखाई जहाँ समाज के कुछ वर्गों के लोग आसानी से अदालत की शरण नहीं ले सकते थे. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए न्यायालय ने जनसेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को जरूरतमंद तथा गरीब लोगों की ओर से याचिकाएं दायर करने की इजाजत दी.

जनहित याचिका का प्रभाव

  1. इससे न्यायालयों ने अधिकारों का दायरा बढ़ा दिया
  2. इससे विभिन्न समूहों को भी अदालत जाने का अवसर मिला
  3. इसने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया तथा कार्यपालिका उतरदायी बनने पर बाध्य हुई.
  4. लेकिन इससे न्यायालयों पर काम का बोझ भी पड़ा तथा सरकार के तीनों अंगों के कार्यों के बीच का अंतर धुंधला गया.

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आशा करता हूँ फ्रेड्स आपकों short Notes Essay On Public Interest Litigation In Hindi का यह लेख अच्छा लगा होगा, जनहित याचिका पर निबंध पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें.

 

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