श्री नारायण गुरु की जीवनी | Narayana Guru Biography In Hindi

नारायण गुरु की जीवनी Narayana Guru Biography In Hindi: श्री नारायण गुरु केरल के एक प्रसिद्ध सामाजिक व धार्मिक सुधारक थे. वे झझवास जाति के लोगों के लिए एक प्रेरक प्रतिनिधि के रूप में आगे बढ़ कर आये जिन्हें अछूत जाति के रूप में विचारित व व्यव्ह्त किया जाता था. उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व व पुरोहिताई का जमकर विरोध किया तथा सभी जातियों के लिए मन्दिर में प्रवेश के अधिकार का प्रबल समर्थन किया.

Narayana Guru Biography In Hindi

Narayana Guru Biography In Hindi

sree narayana guru in hindi: 1888 में श्री नारायण गुरुने अरविन्दपुरम आंदोलन की शुरुआत की तथा ब्राह्मण धर्म के नियमों की अवहेलना करते  हुए अरविन्दपुरम में एक शिव मूर्ति की स्थापना की. शिव मन्दिर की दीवारों पर उन्होंने यह शब्द लिखा- जाति, घ्रणा, इर्ष्या व अविश्वास आदि के आधार पर मजबूत हो चली दीवार को तोड़ दो तथा आपस में भाईचारे का बीज बोओ ताकि लोग साथ रह सके.

1902-03 में उन्होंने श्री नारायण धर्म परिपालन योजना की स्थापना की जिसके अंतर्गत सामाजिक एकता के लिए सतत प्रयत्न शील रहे, इस आंदोलन की मांग निम्नवत थी.

  1. पब्लिक स्कूलों में प्रवेश का अधिकार
  2. सरकारी नौकरियों में भर्ती करना
  3. सड़को का निर्माण व मन्दिरों में सबसे लिए प्रवेश
  4. पिछड़ी जाति के लोगों की तरफ से राजनीति में प्रतिनिधित्व देना आदि.

नारायण गुरु का प्रारम्भिक जीवन एक धार्मिक माहौल के मध्य व्यतीत हुआ, उनके घर के पास ही माँभद्रादेवी  प्रसिद्ध मन्दिर था. जब वे छोटे थे तो किसी को नहीं पता था कि आने वाले समय में ये केरल के महान संत व समाज सुधारक होगे तथा समाज में व्याप्त रुढियों को समाप्त कर एकता स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगे.

बालपन से वैराग्य मन उस परम तत्व की खोज में अरुविप्पुरम की शरण में आ गये. नारायण गुरु एकांत वास में जंगल में रहने लगे. परमेश्वरन पिल्लै उनका प्रथम शिष्य था जो जंगल में पशु चारण का कार्य किया करता था. पिल्लै नारायण गुरु की प्रथम भेंट से उनका मुरीद हो गया. उन्ही ने नारायण गुरु के बारे में लोगों को बताया. धीरे धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई तथा लोग उनसे आशीर्वाद लेने आने लगे.

हिन्दू धर्म में मन्दिरों को लेकर जात पांत के भेदभाव तथा स्त्रियों को मन्दिर में जाने की मनाही थी, नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जिसमें सभी जाति पांति के लोग प्रवेश कर सके. तथा छोटे बड़े व स्त्री पुरुष का कोई भेद न हो. दक्षिण केरल में एक स्थान हैं अरुविप्पुरम, जो आज एक तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता हैं.

वैसे तो अरुविप्पुरम में अन्य मन्दिरों की तरह मंदिर ही हैं. मगर नैयर नदी के तट पर नारायण गुरु ने एक ऐसे दौर में सभी जाति के लोगों सभी वर्गों के लिए बनाया था जिसमें सभी लोग आकर पूजा कर सकते थे. जाति  की  जंजीरों में बंधे भारतीय समाज ने इस कार्य का पुरजोर विरोध किया था. यहाँ तक कि ब्राह्मण आदि ने इसे महान पाप तक करार दिया. मगर नारायण गुरु का मानना था कि ईश्वर न तो पंडित में न किसान में बल्कि सभी में बसता हैं.

नारायण गुरु एक ऐसे पंथ की खोज थे जो आम लोगों के भावों उनकी भावनाओं से जुड़ा होता हैं. निम्न व शोषित वर्ग के लोग भी अपने अभिमान के साथ जी सके. केरल में उस दौर में भी देवी देवताओं की पूजा की जाती थी.निम्नजाति के लोग अपने आदिमों की पूजा करते थे. मगर उच्च जातीय लोग उन्हें हेय की नजर से देखते थे. नारायण गुरु समाज के इसी दोगलेपन के खिलाफ थे उनके विचार थे कि सभी इंसानों की एक ही जाति एक ही धर्म तथा उसका एक आराध्य होना चाहिए.

वंचित तबके को मुख्य धारा में लाने के नारायण गुरु के छुआछूत व भेदभाव को मिटाने के कार्यों की हर किसी ने प्रशंसा की, जब महात्मा गांधी उनसे मिले तो उनकी इस कार्य के लिए तारीफ़ भी की. हालांकि नारायण गुरु समाज में  मन्दिरों  को  स्थान  देना चाहते थे.  जिसमें  सभी वर्गों  के  लोग  प्रवेश ले सके. वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे मगर राजा राममोहनराय तथा  महर्षि दयानन्द सरस्वती की तरह वे विरोधी न होकर आम आदमी को ईश्वरीय हक देने के लिए मूर्ति पूजा का विरोध करते थे.

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