Swami Karpatri Ka Jivan Parichay & History

Swami Karpatri Jivan Parichay-हिन्दू धर्म के महान संत जिन्हें आधुनिक धर्म सम्राट भी कहा जाता हैं. स्वामी करपात्री जी एक समाज सुधारक संत और राजनेता थे. अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक हिंदूवादी दल के संस्थापक और अद्वैत दर्शन के ज्ञाता थे. स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य के रूप में प्रसिद्ध हुए करपात्री जी तीव्र बुद्दि के धनी थे. कहा जाता हैं, यदि वे किसी बात या तथ्य के का एक बार वाचन कर लेते तो वह उन्हें याद रह जाता था, यदि इस बारे में उनसे कभी पूछा जाता तो झट से बता देते थे. ये फला पुस्तक के इस पेज संख्या पर हैं. आइये जानते हैं, ऐसे महान संत स्वामी करपात्री के सक्षिप्त जीवन और इतिहास को.

Swami Karpatri Ka Jivan Parichay & History

स्वामी का का मूल नाम हर नारायण ओझा था,

उनका जन्म वर्ष 1907 में उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में बताया जाता हैं. हिन्दू परम्परा के अनुसार इन्होने छोटी उम्र में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था. संत परम्परा के अनुसार सन्यासी बनने के पश्तात इन्हे अपने गुरु के नाम पर हरिहरानन्द सरस्वती का नया नाम मिला था.

हालाँकि लोग इन्हे करपात्री महाराज के रूप में ही जानते थे.

धर्मसंघ के संस्थापक ने 1923 में 17 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर वाराणसी की एक मठ को ही अपनी कर्मस्थली चुनी. सन्यास लेने से पूर्व करपात्री महाराज का विवाह को चूका था. इनके एक पुत्री भी थी.

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स्वामी का बालविवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में हो गया था.

महादेवी जी के साथ विवाह के कुछ ही वर्ष बाद इन्होने गृहत्याग कर ब्रह्मचारी बन गये थे. इन्होने विधिवत शिक्षा स्वामी विश्वेश्वराश्रम से प्राप्त की. इन्ही के सानिध्य से करपात्री जीने व्याकरण दर्शन गीता और वेदांत का ज्ञान प्राप्त किया.

आजीवन तक करपात्री जी महाराज हिन्दू धर्म की निस्वार्थ सेवा करते रहे, उन्होंने कई धार्मिक ग्रंथो की रचना की. करपात्री की रचनाओं में vedaarth paarijaat, raamaayan meemaansa, vichaar peeyoosh, maarksavaad aur raamaraajy प्रमुख थी.

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घर से निकलने के बाद करपात्री जी हिमालय पहुच गये.

यही से इन्होने मानवसेवा, हिंदुत्व और आत्मदर्शन का सकल्प किया. वहा से लौटकर धर्म नगरी कांशी में सन्यासी जीवन व्यतीत करने लगे. कम वस्त्र और सुविधाओ के अभाव में ही इन्होने सन्यासी जीवन व्यतीत किया. माँ गंगे की तट पर बनी एक कुटिया में निवास करना. भिक्षा लाना, भजन और पूजा ही उनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी थी.

विद्या अध्ययन में अदितीय स्वामी प्रतिपदा के दिन गंगा के तट पर एक कील ठोककर पुरे 24 घंटे तक एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या किया करते थे.

उनकी इन कठोर साधना और भक्ति के कारण ही करपात्री महाराज कहलाए.

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हिन्दू दशनामी परम्परा के सन्त और अपनी ओजस्वी वाणी और भाषणों के धनी स्वामी करपात्री ने गौ हत्या पर रोक, बुचडखाने बंद करवाने और धार्मिक सुधार की पहल ने एक सामाजिक आन्दोलन का रूप ले लिया था. इन्होने वर्ष 1948 में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना की.

जो एक हिंदूवादी राजनितिक दल था.

वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में यह दल तीन सीट प्राप्त करने में कामयाब रहा.

फिर 57 और 1962 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इनकी पकड़ मजबूत होती गईं. राजस्थान के क्षेत्र में इस दल की अच्छी पकड़ थी. इस धार्मिक दल ने दर्जनों सीट जीतने में कामयाबी हासिल की.

वर्ष 1980 में स्वामी करपात्री जी की मृत्यू हो गईं थी.

swami karpatri Information & Facts

  • मूल नाम  -: हर नारायण ओझा
  • जन्म वर्ष  -: 1906
  • जन्म स्थान  -:  प्रतापगढ़, भटनी
  • उपाधि  -: करपात्री महाराज
  • पुस्तके -:गोपी गीत, भक्ति सुधा, भागवत सुधा
  • राजनितिक दल -: अखिल भारतीय राम राज्य परिषद
  • मृत्यु -: 1980

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