मेहरानगढ़ किले का इतिहास | Mehrangarh Fort Jodhpur History in hindi

Mehrangarh Fort Jodhpur History जोधपुर किला & मेहरानगढ़ किले के बारे में : राजस्थान के प्रसिद्ध किलों में मेहरानगढ़ का महत्वपूर्ण स्थान है यह राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित हैं. भारत के वैभवशाली इतिहास के प्रतीक इस दुर्ग का निर्माण राव जोधा द्वारा करवाया गया था.

जोधपुर शहर से Mehrangarh Fort – मेहरानगढ़ किला तकरीबन साढ़े चार सौ फीट की ऊँचाई पर बना हुआ हैं. किले में प्रवेश के लिए सात द्वार बनाए गये हैं. दुर्ग में बना संग्रहालय राजस्थान के बड़े म्यूजियम में से एक हैं. राठौड़ों के शौर्य के प्रतीक मेहरानगढ़ किले के बारे में आज हम विस्तार से इसका इतिहास जानेगे.मेहरानगढ़ किले का इतिहास | Mehrangarh Fort Jodhpur History in hindi

मेहरानगढ़ किले का इतिहास | Mehrangarh Fort Jodhpur History in hindi

मेहरानगढ़ के किले का निर्माता जोधपुर नगर का संस्थापक राव जोधा था. राव जोधा ने 13 मई 1459 को चिड़ियाटुंक नामक पहाड़ी जो योगी चिड़ियानाथ के नाम पर, जिसका स्थान आज भी किले के पीछे विद्यमान हैं, पर किले की नीव रखी गई.

ऐसी मान्यता है कि किले की नींव में राजिया नामक व्यक्ति को जिन्दा दफन किया था. मयूराकृति का होने के कारण जोधपुर के किले को मयूरध्वज गढ़ भी कहा जाता हैं. राव जोधा ने इस किले के चारो ओर एक नगर बसाया जो उनके नाम पर जोधपुर कहलाया.

राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों में सबसे प्रमुख यह किला अपनी विशालता के कारण मेहरानगढ़ कहलाया. मेहरानगढ़ किला भूमितल से 400 फीट ऊँचा हैं. किले के चारो ओर सुद्रढ़ परकोटा हैं. जो लगभग 20 फीट से 120 फीट तक ऊँचा और 12 से 50 फीट चौड़ा हैं.

किले की लम्बाई 500 और चौड़ाई में 250 गज है. इसकी प्राचीर में विशाल बुर्जे बनी हुई हैं. मेहरानगढ़ के दो बाह्य प्रवेशद्वार हैं. उत्तर पूर्व में जयपोल और दक्षिण पश्चिम में फतेहपोल. धुर्वपोल, सूरजपोल, इमरतपोल, भैरोंपोल आदि अन्य प्रवेश द्वार हैं.

मेहरानगढ़ किले का इतिहास Mehrangarh Fort Jodhpur History

1544 ई में इस किले पर शेरशाह सूरी ने अधिकार कर लिया था. लेकिन 1545 ई में मालदेव ने पुनः इसे अपने आधिपत्य में ले लिया था. 1565 ई में मुगल सूबेदार हसन कुली खां ने चन्द्रसेन का आधिपत्य समाप्त कर इस पर मुगल आधिपत्य की स्थापना की.

मुगल आधिपत्य स्वीकार करने पर मोटा राजा उदयसिंह को 1582 ई में जागीर के रूप में दे दिया. 1678 ई में औरंगजेब ने इसे मुगल राज्य में मिलाया. 1707 ई में औरंगजेब की मृत्यु हो जाने पर अजीतसिंह ने मुगल सूबेदार जफर कुली खां से इसे छीन लिया. तब से मेहरानगढ़ किला राठौड़ों का निवास स्थान रहा.

ब्रिटिश साहित्यकार रूडयार्ड किपलिंग ने एक लबा समय इस किले में बिताया. उसने मेहरानगढ़ को देवताओं, परिओं और फरिश्तों द्वारा निर्मित माना. लाल पत्थरों से निर्मित मेहरानगढ़ स्थापत्य कला की दृष्टि से बेजोड़ हैं. महाराजा सूरसिंह द्वारा निर्मित मोती महल सुनहरी अलंकरण के लिए प्रसिद्ध हैं.

इसकी छत व दीवारों पर सोने की पॉलिश का कार्य महाराजा तख्तसिंह की देन हैं. अभयसिंह द्वारा निर्मित फूलमहल पत्थर की बारीक खुदाई के लिए प्रसिद्ध हैं. तख्त विलास, अजित विलास, उम्मीद विलास, आदि का भीतरी वैभव दर्शनीय है.

महलों में नक्काशी, मेहराबों झरोखों और जालियों की बनावट हैरत में डालने वाली हैं. चोखेलाव महल, बिचला महल, महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश नामक पुस्तकालय, सीणगार चौकी आदि की वास्तुकला भी प्रशंसनीय है. सीणगार चौकी पर जोधपुर के शासकों का राजतिलक होता था. किले के चामुंडा माता, मुरली मनोहर व आनन्दघनजी के मंदिर हैं.

किले के भीतर राठौड़ो की कुलदेवी नागणेची माता व भूरे खां की मजार स्थापित हैं. चामुंडा माता मंदिर का निर्माण राव जोधा ने दुर्ग निर्माण के समय कराया था. जिसका महाराजा तख्तसिंह ने 1857 ई में जीर्णोद्धार करवाया. मेहरानगढ़ के किले में जलापूर्ति के लिए राणीसर और पद्म सागर जलाशय हैं. इस किले की भव्यता के सम्बन्ध में निम्न उक्ति प्रसिद्ध हैं.

सब ही गढ़ा सिरोमणि, अति ही ऊँचों जाण
अंनड पहाडा उपरे, जबरों गढ़ जोधाण

जोधपुर किले की जानकारी व इतिहास (Information and History of Jodhpur Fort)

महाराज जसवंत सिंह ने मेहरानगढ़ के किले का निर्माण पूरा करवाया गया था. इस किले में सात द्वार माने गये है जिनमें एक गुप्त द्वार भी हैं. जिसके बारे में जानकारी उस किले में रहने वाले लोगों को ही हुआ करती हैं. सबसे बड़े द्वार जयपोल के सम्बन्ध में कहा जाता हैं. कि इसे मानसिंह द्वारा जयपुर और बीकानेर की विजय के उपलक्ष्य में बनाया था.

राव जोधा माँ चामुंडा के भक्त थे, अपनी श्रद्धा से इन्होने किले के पास ही चामुंडा माँ का एक मंदिर भी बनाया था. जोधपुर के अधिकतर लोगों में चामुंडा के प्रति गहरी आस्था है नवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में पूजा पाठ का विशेष आयोजन किया जाता हैं.

मेहरानगढ दुर्ग की नीव के सम्बन्ध में एक दर्दनाक घटना भी जुड़ी हुई हैं. बताया जाता है कि ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (तदनुसार, 12 मई 1459 ई) वार शनिवार के दिन इस दुर्ग की नीव में राजाराम मेघवाल को जीवित दफन कर दिया था. बाद में जोधपुर के शासकों ने सूरसागर के पास राजाराम के नाम पर भूमि भी दी, जो राजबाग के रूप में विख्यात हैं. यहाँ होली के मौके पर उत्सव का आयोजन भी किया जाता हैं.

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